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Harsimrat Kaur Badal ने किसानों से जुड़े नए बिल के विरोध में दिया इस्तीफा

 


हरसिमरत कौर बादल ने मोदी कैबिनेट से दिया इस्तीफ़ा

केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने मोदी कैबिनेट से इस्तीफ़ा देकर अपनी पार्टी शिरोमणि अकाली दल के कड़े रुख़ का संकेत दिया है.

शिरोमणि अकाली दल लंबे समय से बीजेपी की सहयोगी पार्टी रही है. हरसिमरत का इस्तीफ़ा तीन अध्यादेशों के ख़िलाफ़ है. ये तीन अध्यादेश हैं- उत्पाद, व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020, किसान सशक्तीकरण और संरक्षण अध्यादेश और आवश्यक वस्तु (संशोधन).

अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल का कहना है कि उनकी पार्टी से इन अध्यादेशों को लेकर संपर्क नहीं किया गया, जबकि हरसिमरत कौर ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी और कहा था कि 'पंजाब और हरियाणा के किसान इससे ख़ुश नहीं हैं.'

केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के बाद हरसिमरत कौर बादल ने ट्वीट किया, "मैंने केंद्रीय मंत्री पद से किसान विरोधी अध्यादेशों और बिल के ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा दे दिया है. किसानों की बेटी और बहन के रूप में उनके साथ खड़े होने पर गर्व है."

लेकिन एक महीने से भी कम वक़्त हुआ, जब अकाली दल ने इन अध्यादेशों का बचाव किया था.

28 अगस्त को पंजाब विधानसभा के सत्र की शुरुआत से पहले सुखबीर सिंह बादल ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का एक पत्र दिखाया था और कहा था कि 'न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी में कोई बदलाव नहीं होगा.'

उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पर किसानों को भ्रमित करने का आरोप लगाया था. अब सुखबीर और उनकी पत्नी, दोनों इन अध्यादेशों का विरोध कर रहे हैं.

अकाली दल का विरोध क्या है?

पंजाब में किसान अकाली दल की रीढ़ हैं. इस हफ़्ते की शुरुआत में ही सुखबीर सिंह बादल ने कहा था कि 'सभी अकाली किसान हैं और सभी किसान अकाली हैं.'

पंजाब की सभी किसान यूनियन अपने मतभेदों को किनारे रखकर इन अध्यादेशों का विरोध कर रही हैं.

मालवा बेल्ट के किसान यह चेतावनी जारी कर चुके हैं कि जो भी नेता इन अध्यादेशों का समर्थन करेगा, उन्हें गाँवों में नहीं घुसने दिया जाएगा.

100 साल पुरानी पार्टी - अकाली दल पंजाब में अभी हाशिये पर है. साल 2017 के विधानसभा चुनाव में 117 सीटों वाली विधानसभा में पार्टी महज़ 15 सीटों पर ही सिमटकर रह गई थी. ऐसे में अकाली दल अपने वोट बैंक को किसी भी सूरत में और नाराज़ नहीं करना चाहता.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह पार्टी के अस्तित्व का सवाल है.

साल 2017 से पहले अकाली दल लगातार दो बार सत्ता में रहा. 2017 के चुनाव में बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल गठबंधन को महज़ 15 फ़ीसदी सीटों पर जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस को 1957 के बाद सबसे बड़ी जीत मिली.

एमएसपी को लेकर चिंता

कहा जा रहा है कि किसानों के आंदोलन के सामने अकाली दल को झुकना पड़ा है, नहीं तो वो बीजेपी का विरोध करने की स्थिति में नहीं थे.

पंजाब में किसानों को डर है कि आने वाले वक़्त में एमएसपी को ख़त्म कर दिया जाएगा. दूसरी तरफ कमीशन एजेंटों को डर है कि उनके कमीशन ख़त्म हो जाएंगे.

बीबीसी पंजाबी सेवा के संपादक अतुल सेंगर कहते हैं, ''अकाली दल ने मजबूरी में यह फ़ैसला लिया है. इनके ख़िलाफ़ किसानों में बहुत ग़ुस्सा है. हालांकि यह ग़ुस्सा अब भी शांत नहीं हो जाएगा क्योंकि एनडीए के साथ ये अब भी हैं. मुझे नहीं लगता कि ये अभी एनडीए से अलग होने की स्थिति में हैं. लेकिन दूसरी तरफ़ अकालियों के ख़िलाफ़ कई गाँवों में पोस्टर लगा दिये गए थे और ये बहुत दबाव में थे."

वे कहते हैं, "पंजाब और हरियाणा के किसान इसलिए सबसे ज़्यादा परेशान हैं क्योंकि एफ़सीआई यहाँ से भारी मात्र में चावल और गेहूँ की ख़रीदारी एमएसपी पर करती है. यहाँ के किसानों को लग रहा है कि आने वाले दिनों में एमएसपी ख़त्म कर दिया जाएगा.''

दाँव पर क्या लगा है?

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, यहाँ 12 लाख परिवार किसान हैं और 28 हज़ार रजिस्टर्ड कमीशन एजेंट (आढ़तिया) हैं.

पंजाब की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार की एजेंसियों के फ़ंड पर निर्भर है. इनमें एफ़सीआई सबसे प्रमुख है.

पंजाब में होने वाले गेहूँ और चावल का सबसे बड़ा हिस्सा या तो पैदा ही एफ़सीआई द्वारा किया जाता है, या फिर एफ़सीआई उसे ख़रीदता है. साल 2019-2020 के दौरान रबी के मार्केटिंग सीज़न में, केंद्र द्वारा ख़रीदे गए क़रीब 341 लाख मिट्रिक टन गेहूँ में से 130 लाख मिट्रिक टन गेहूँ की आपूर्ति पंजाब ने की थी.

वहीं साल 2018-19 में केंद्र द्वारा की गई 443 लाख मेट्रिक टन गेहूँ की कुल ख़रीद में से 113.3 लाख मेट्रिक टन गेहूँ पंजाब से लिया गया था.

प्रदर्शनकारियों को यह डर है कि एफ़सीआई अब राज्य की मंडियों से ख़रीद नहीं कर पाएगा, जिससे एजेंटों और आढ़तियों को क़रीब 2.5% के कमीशन का घाटा होगा. साथ ही राज्य भी अपना 6 प्रतिशत कमीशन खो देगा, जो वो एजेंसी की ख़रीद पर लगाता आया है.

प्रदर्शनकारियों की समझ है कि ये अध्यादेश जो किसानों को अपनी उपज खुले बाज़ार में बेचने की अनुमति देता है, वो क़रीब 20 लाख किसानों- ख़ासकर जाटों के लिए तो एक झटका है ही. साथ ही मुख्य तौर पर शहरी हिन्दू कमीशन एजेंटों जिनकी संख्या तीस हज़ार बताई जाती है, उनके लिए और क़रीब तीन लाख मंडी मज़दूरों के साथ-साथ क़रीब 30 लाख भूमिहीन खेत मज़दूरों के लिए भी यह बड़ा झटका साबित होगा.

अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भी गुरुवार को लोकसभा में यही आँकड़े दिए और कहा कि 'सरकार 50 साल से बनी फसल ख़रीद की व्यवस्था को बर्बाद कर रही है और उनकी पार्टी इसके ख़िलाफ़ है.'

अकाली-बीजेपी आमने-सामने, नुकसान किसका?

अब जो स्थिति बनी है, उसके बाद अकाली दल और बीजेपी के संबंधों में खटास पड़ने की काफ़ी संभावना जताई जा रही है. हालांकि, इस तरह की अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि एस एस ढिंडसा के नेतृत्व वाले अकाली दल के साथ अपने संबंधों में कुछ बदलाव करने के बारे में बीजेपी सोच ही रही थी.

इसके अलावा, माना यह भी जा रहा है कि सुखबीर सिंह बादल ने अपने पिता प्रकाश सिंह बादल की तरह एनडीए गठबंधन को बनाए रखने की 'मज़बूत इच्छाशक्ति' भी नहीं दिखाई है.

लेकिन इन अध्यादेशों का नुक़सान बीजेपी को भी होगा, ख़ासकर बीजेपी के शहरी वोट बैंक में जिसमें कमीशन एजेंट शामिल हैं और पार्टी को यह भी सोचना होगा कि अगले पंजाब विधानसभा चुनाव में वो किस आधार पर इन लोगों के बीच जाकर वोट माँगेगी.

दूसरी ओर, अकाली दल द्वारा अपने ही गठबंधन सरकार के ख़िलाफ़ कार्रवाई किए जाने से केंद्र में बीजेपी की किरकिरी होगी.

पंजाब के राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि हर कैबिनेट सदस्य कैबिनेट के निर्णयों से बाध्य होता है. पर हरसिमरत का इस्तीफ़ा अपरिहार्य रहा क्योंकि अध्यादेशों के ख़िलाफ़ जाकर उन्होंने आर्टिकल-75 का उल्लंघन किया होगा.

पर सवाल है कि क्या अकाली दल ने पहली बार ऐसा किया? तो जवाब है- नहीं.

इसी साल जनवरी में अकाली दल ने पंजाब विधानसभा में एक प्रस्ताव का समर्थन किया था जो केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के ख़िलाफ़ था, जबकि संसद में पार्टी ने इस अधिनियम के समर्थन में वोट किया था. बाद में, पार्टी ने इस मुद्दे पर भाजपा के साथ अपने मतभेदों को लेकर दिल्ली विधानसभा चुनाव अलग लड़ने का फ़ैसला किया था.

इसी हफ़्ते की शुरुआत में, सुखबीर सिंह बादल ने केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के लिए नई भाषाओं के बिल में पंजाबी को शामिल ना करने पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि 'यह खालसा राज के समय से ही स्थानीय लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है.'

 

 

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